Sunday, February 4, 2018

प्यार क्या होता है,
जानता नहीं दिल मेरा.!
पूछता हूँ रब से मैं,
क्या मोहब्बत है नाम तेरा..!!
Pyar kya hota hai,
Jaanta nahi Dil mera..
Puchhta hoon rab se main,
Kya mohabbat hai naam Tera..

दीवाने क्यों हो जाते हैं?
जिनको भी इश्क़ हुआ.!
दर्द में भी सुकून है क्यों?
किसकी होती है दुआ..??
Deewane kyon ho jate hain?
Jinko bhi ishq hua..
Dard mein bhi sukoon hai kyon?
Kiski hoti hai Dua??

आशिक़ी की हद है क्या,
समझ सका ना दिल मेरा.!
क्यों चाँद तारों फूल कलियों में?
दिखता है बस एक चेहरा..!!
Aashiqui ki had hai kya,
Samajh saka na Dil mera..
Kyun Chand Taaron Phool Kaliyon mein,
Dikhta hai bas ek Chehra..

आँखों से बातें करते हैं,
कभी हँसते हैं कभी रोते हैं.!
असर इतना गहरा होता है कि,
आँसू को भी मोहब्बत कहते हैं..!!
Aankhon se baatein karte hain,
Kabhi haste hain kabhi rote hain..
Asar itna gahra hota hai ki,
Aansu ko bhi mohabbat kahte hain..

रूसवाई का डर होता नहीं,
दिल में जब हो प्यार वफ़ा.!
जग रूठे तो रूठ जाये,
बस प्यार ना हो कभी ख़फ़ा..!!©RRKS!!
Ruswai ka darr hota nahi,
Dil mein jab ho pyar wafa..
Jag ruthe to ruth jaye,
Bas pyar na ho kabhi khafa..!!©RRKS!!

Saturday, June 10, 2017

बारिश की पहली बूँद मुझसे जब टकराई,
पुछा कहाँ थी अब तक तुम क्यों इतना सबको तड़पायी.!
सुन ज़वाब उसकी हो गयी बोलती मेरी बंद,
मौसम परिवर्तन में थी हमारी ग़लतियों से सम्बंध..!!

हम सब तो समय से हैं आते,
अपनी भूमिका खूबसूरती से हैं निभाते.!
अहमियत प्रकृति की ना जाने तुम कब समझोगे,
खुद के साथ इस सृष्टि को भी तुम जल्द ही खो दोगे..!!

प्रदूषण तुम फैलाते हो,
वृक्ष को भी हटाते हो.!
सारे साधन खुद ही खत्म किये,
फिर हाय तौबा मचाते हो..!!

कुदरत की है ये माया,
कहीं है धूप तो कहीं है छाया.!
एक दूसरे पे सब है निर्भर,
पृथ्वी हो या हो अम्बर..!!

प्रकृति से अब ना खेलना,
वक़्त रहते इस बात को समझना.!
सम्पदा है ये सीमित,
सभी के लिये पर है निर्मित..!!

बात मेरी अब समझ है आई,
क्यों कुदरत हमसे है कतराई.!
सबको ये बात समझना होगा,
भविष्य के लिये हमें आज सँजोना होगा..!!©RRKS.!!

Sunday, December 18, 2016

तुम्हारी आँखों में, प्यार पढ़ लेता हूँ.।
झुकती उठती नजरों में, खुद को देख लेता हूँ..॥
Tumhari aankhon mein,
Pyar padh leta hoon..
Jhukti uthti nazaron mein,
Khud ko dekh leta hoon..

मुस्कुुराते होठों से, भले कुछ ना कहो तुम.।
मुस्कुराहट को ही मैं, हाँ समझ लेता हूँ..॥
Muskurate hothon se,
Bhale kuch na kaho tum..
Muskurahat ko hi main,
Haan samajh leta hoon..

नजरें चुराकर सबसे, मुझको देखते हो तुम.।
और पुछते हो मुझसे, क्यूँ मैं देखता हूँ.?
Nazarein churakar sabse,
Mujhko dekhte ho tum..
Aur puchhte ho mujhse,
Kyun main dekhta hoon.?

क्यूँ चेहरे पे शिकन, तुम्हारे आ जाते हैं.।
किसी और से जब मैं, बातें खूब करता हूँ..॥
Kyun chehre pe shikan,
Tumhare aa jaate hain.?
Kisi aur se jab main,
Baatein khub karta hoon..

बातें अपनी तुम, बखूबी छुपाते हो.।
पर हर बात में तुम्हारे, मैं प्यार ढूँढ लेता हूँ..॥
Baatein apni tum,
Bakhubi chhupate ho..
Par har baat mein tumhare,
Main pyar dhoondh leta hoon..

तुम्हारी अदायें अब तुम्हारा, साथ नहीं देते.।
उन्हें खबर है कि, मैं उनका भी दीवाना हूँ..॥
Tumhari adayein ab tumhara,
Saath nahi dete..
Unhe khabar hai ki,
Main unka bhi deewana hoon..

कहता है दिल मुझसे, तू ही इजहार कर दे.।
मगर इंकार से तुम्हारे, मैं तो डरता हूँ..॥
Kahta hai dil mujhse,
Tu hi izhaar kar de..
Magar inkaar se tumhare,
Main to darta hoon..

प्यार का इकरार,जाने कब करोगे तुम.?
हर घड़ी बस, यही मैं सोचता हूँ..॥©RRKS।।
Pyar ka ikraar,
Jaane kab karoge tum.?
Har ghadi bas,
Yahi main sochta hoon..©RRKS

Sunday, August 14, 2016

"आज़ादी का मतलब"

विश्व में पुरूष और महिला को बराबर कहा जाता है, भारत में तो नारियों को देवी तक का दर्जा दिया जाता है। मगर कहने और समझने का अंतर रोज़ ही दिख जाता है। आज विश्व में ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ नारी ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सके। विश्व भर से कितने ही नारी शोषण की ख़बरें रोज़ देखने, सुनने और पढ़ने के लिए मिलते हैं। ऐसे ख़बरों को सुन के अरमान नामक युवक नेता, अभिनेता, सिनेमा और कईयों को ज़िम्मेदार बताने लगा फिर बड़े मज़े से 'मेरे फ़ोटो को सीने से यार, लगा ले सईंया फेविकोल से' गाना सुनने लगा। उसकी बात सुन उसके दोस्त अमन ने कहा- अरमान शायद पहले हम ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं इन सब के लिए तब कोई और। हम ही हैं जो या तो बढ़ावा देते हैं या नज़र अंदाज कर देते हैं बहुत से ग़लतियों को और बाद में उनको ही दोष देते हैं। अब जैसे जिस गाने को तुम सफल गाने के रूप में समझ गुनगुना रहे हो उसके बोल निम्न स्तर(low level) का होते हुए भी तुम्हें उसमें कोई बुराई नहीं दिखी। अरमान ने अमन को कहा- क्या यार तुम भी हर बात में अब बुराई निकालने लगे, बस गाना ही तो है। अमन ने 'मैं तो तंदूरी चिकेन हूँ यार, गटका ले मुझे अल्कोहल से' बोल को सुनाते हुए अरमान से कहा- ये दर्शाता है औंरतों के प्रति सोच को और मैं भी किसी गाने को ज़िम्मेदार नहीं बोल रहा मगर आज ज़रूरत है सोच में बदलाव लाने की, सिर्फ़ कहने के लिए नहीं बल्कि अमल करने के लिए भी। ऐसे तो तुम किसी भी गाने का अर्थ अपने अनुसार बना सकते हो और दोष किसी और को दे सकते हो- अरमान ने अमन से कहा। अमन ने बड़े शालीनता से कहा- तुम भी तो कुछ देर पहले यही कर रहे थे। मगर ज़िम्मेदार तो हैं समाज ये भी सत्य है, अगर हम अपनी ज़िंदगी में ही नज़र डाले तो कई उदाहरण मिल जायेंगे ये साबित करने के लिए। चलो आज तुम को बचपन की कई बातें बताता हूँ जो तुम नहीं जानते और कई बातें तुम्हें याद दिलाता हूँ जो सिर्फ़ शरारत नहीं थे-अमन ने अरमान से कहा।

अमन और अरमान की दोस्ती बचपन से ही थी। दोनों एक ही क्लास(कक्षा) में पढ़ते थे, स्कूल के बाद भी वो साथ ही खेलते थे चूँकि दोनों एक ही मोहल्ला में रहते थे। तुम्हें याद होगा अरमान, जब हम नौ या दस साल के थे तब तुम, सलमान, शिव, कमल, रमेश और मैं साइकिल रेस करते थे। हम पाँचों अपनी-अपनी साइकिल लेकर रोज़ कम से कम दस चक्कर(राउंड) लगाते थे। एक दिन चक्कर लगाते वक़्त मैं पिछे रह गया था, उस दिन असल में एक लड़का जिसकी उम्र क़रीब बीस साल होगी ने मुझे रोका था। पहले तो वो मुझसे पूछा कहाँ रहते हो, कहाँ पढ़ते हो फिर उसने पूछा एक बहुत अच्छी पुस्तिका(बुक) है मेरे पास क्या तुम लोगे.? मेरे पास पैसे थे भी नहीं और मुझे तुम लोगों को पकड़ना भी था तो मैं मना कर जाने लगा, तभी वो मेरे साइकिल के हैंडल को पकड़ के मुझसे बोला- पहले देख तो लो कैसी और कितनी मज़ेदार है ये पुस्तक, मना नहीं करोगे फिर। फिर उसने अपने किताब के अंदर से एक किताब निकाली और मुझे दिखाने लगा। उस किताब में नग्न(न्यूड) लड़कियों की तस्वीरें थी, देखते ही मुझे बड़ा अजीब लगा और मैं दूसरे तरफ़ देखकर बोला- भैया, मुझे नहीं लेना ये किताब और मुझे मेरे दोस्तों के पास जाना है। मगर वो तो जैसे उस किताब को बेचने ही निकला था, कहा- अरे तुम देखो तो इसको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा इससे। मैं डर गया था तब, समझ नहीं आ रहा था कैसे वहाँ से भागूँ । कोई उधर से गुज़र भी नहीं रहा था, इतने में तुम सब आते दिखे तो मुझे सुकून मिला और मैंने बोला- भैया, वो देखो मेरे दोस्त आ रहे हैं उनको दे देना आप ये किताब। उसने बोला- लेना है तो लो वरना मैं जा रहा हूँ, ये कहकर वो चला गया। तुम सब मेरे पास आयें और पूछे- कौन था वो? मुझे उस समय बहुत अजीब लग रहा था जो आज भी बता नहीं सकता मगर तुम लोगों को देख बहुत ख़ुशी हुई थी तो मैंने बस इतना कहा था- पता नहीं कोई गन्दी किताब बेचने वाला था, और फिर हमलोग साथ साइकिल चलाने लगें थे। फिर तुम्हें याद होगा, जब हम क्लास ऐट(आठवीं) में थे तो हमारे क्लास में एक लड़का था कुणाल, जो सबको एक जगह बिठाकर कुछ किताबें दिखाता और कुछ कहानियाँ सुनाता था। हाँ भाई उसे कौन भुल सकता है, उसने ही तो हमारे क्लास को बिगाड़ा था। कुणाल भी वैसी ही पुस्तक दिखाता था सबको जैसी पुस्तक की तुम बात कर रहे थे, अब समझ आया तुम क्यों हमारे साथ नहीं रहते थे उस वक़्त- अरमान ने कहा। अमन मुस्कुराकर बोला- भाई उसने किसी को नहीं बिगाड़ा, सब अपनी मर्ज़ी से बिगड़े। सबको मज़ा आता था उसकी बातें सुनकर इसलिए उसका साथ देते थे और जब भी बात उठती है उसकी तो सब कहते हैं कि कुणाल ने सब को बिगाड़ा।

अरमान से रहा नहीं गया और ये बताने के लिये कि वो भी महिलाओं की इज़्ज़त करता है, अमन से कहा- तुम्हें शायद याद होगा जब हम क्लास इलेवन(ग्यारहवीं) में थे तो दो लड़कों को बहुत पिटा था क्योंकि उन्होंने रूही नाम की लड़की को छेड़ा था। अमन ने कहा- भाई मुझे याद है, एक को मैंने ही पिटा था और रूही को तुम पसंद करते थे इसलिए उसकी मदद किये थे। अच्छा ठीक है तुम्हें याद होगा संतोष नाम के लड़के को मैंने एक बार पिटा था- अरमान ने कहा। याद है मुझे और ये भी याद है कि उसको तुमने इसलिए पिटा था क्योंकि तुम्हारी बहन की सहेली को उसने छेड़ा था और तुम्हारी बहन तब उसके साथ ही थी- अमन ने कहा। तू भी तो राशि नाम की लड़की को पसंद करता था और उसके लिये कितनों को पिटा भी था फिर भी वो तुमसे नहीं पटी थी- अरमान ने अमन पर व्यंग्य किया। अमन ने शांत भाव से अरमान से कहा- पहले तो मैं ये साफ़ कर दूँ कि मैं राशि को पटाना नहीं चाहता था बल्कि उसे चाहता था मगर कभी उससे कह नहीं सका। उसके आगे-पिछे होता था उसके सुरक्षा के लिये मगर बाद में वो भी छोड़ दिया था, इसलिये नहीं कि वो मुझसे प्यार नहीं करती बल्कि इसलिये क्योंकि मुझे एहसास हुआ था कि मेरे आगे-पिछे होने से वो बहुत असहज महसूस करती थी और शायद डरती भी थी क्योंकि कई बार मेरे साथ सात-आठ दोस्त भी होते थे। तुम्हें प्रयास करना चाहिए था अमन- अरमान ने कहा। अमन ने जवाब में कहा- तुम्हें याद होगा अरमान हमारे साथ एक शेखर नाम का लड़का पढ़ता था, उसकी वजह से मैंने जाना कि लड़के जब झुंड में होते हैं तो कई बार अकेली लड़की को शिकार की तरह देखते हैं। अरमान ने पूछा- क्यों क्या हुआ ऐसा? अमन ने तब बताया- एक बार मैं, शेखर और साथ में तीन-चार दोस्त घूम रहें थे। हम सब फ़िल्मों की बातें कर रहें थे कि हीरो कैसे हीरोइन को पटा लेता है। बातों-बातों में शेखर ने कहा कि वो किसी भी लड़की को बीच रास्ते में भी पकड़ सकता है, मैंने शेखर से कहा- भाई कहने और करने में बहुत अंतर होता है। इतने में उधर से दो लड़कियाँ गुज़र रहीं थी, अचानक शेखर उनकी तरफ़ दौड़ा और एक लड़की की बाँह पकड़ लिया। लड़की ने उसे गाली देते हुए छोड़ने को कहा मगर वो हमारी तरफ़ देख हँसने लगा और बाक़ी भी उसके साथ हँसने लगें। वो लड़की भी हमारी तरफ़ देखने लगी, जब उसकी नज़र मेरी नज़र से मिली तो लगा जैसे वो मदद के लिये मुझे देख रही हो, मेरी नज़र शर्म से झुक गयी। मैं कुछ कहता या करता उसके पहले ही शेखर हँसता दौड़ता हमारे पास आ गया और लड़कियाँ वहाँ से चली गयीं। शेखर पास आकर बोला देखा कितना आसान है, मन तो किया दो तमाचा रख दूँ शेखर की गाल पर मगर मुझे लगा जैसे मेरी भी ग़लती थी उसमें तो मैंने शेखर को ग़ुस्से में बोला- आज के बाद तुम मेरे आस-पास भी मत दिखना, बाक़ियों को भी चेतावनी देकर मैं वहाँ से अकेला अपने घर आ गया। तीन-चार घंटे बाद सभी मेरे घर आयें, एक ने कहा कि शेखर को ग़लती का एहसास है और वो तुमसे माफ़ी माँगने आया है। मैं शेखर से बाहर जाकर मिला, वो मेरे पास आया और कहा- मुझे माफ़ कर दो भाई, मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हुई है मगर अब मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा। शेखर की आँखों में मुझे सच्चाई दिखी, मैंने कहा- कल मिलते हैं आज अपने-अपने घर जाओ। अगले दिन हम मिलें, कई बातें कियें मगर आज तक फिर उस बात की ज़िक्र तक नहीं कियें।

चलो जाने दो पुरानी बातें और आज तुम ये सब बातें क्यों कर रहे हो, आज आज़ादी का जश्न मनाते हैं, आज स्वतंत्रता दिवस जो है- अरमान ने अमन से पूछा। अमन अरमान की आँखों में देखते हुए बोला- यार आज सुबह जब तुमको लेने मैं एयरपोर्ट(हवाई अड्डा) आया था तब क़रीब आधे घंटे मैं तुम्हारा इंतज़ार किया। इस दौरान जब मैं खड़ा था तब मैंने देखा एक लड़की बहुत सुंदर, बहुत ही ख़ूबसूरत मगर बहुत ही छोटे-छोटे कपड़ों में कार पार्किंग से आगमन द्वार(arrival gate) की ओर आने लगी। मन कर रहा था उसे देखूँ मगर उसे ऐसा न लगे की उसके अंगों को देख रहा हूँ इसलिये मैं उसे तिरछी निगाहों से बीच-बीच में देखता की वो किधर जा रही है। कुछ सेकेंड बाद फिर मूँड़ के देखा तो वो दिखी नहीं फिर देखा तो वो लड़की मुझसे केवल दो क़दम दूर खड़ी थी, थोड़ी ही देर बाद वो मुझसे केवल एक क़दम की दूरी पे खड़ी थी जबकि वहाँ बहुत जगह था। आते-जाते सभी लोग उसे ऊपर से नीचे तक देखते जाते। मैं शायद यही देखने लगा और जिस लड़की को मैं दूर से देखना चाह रहा था वो बिलकुल पास थी मेरे, फिर भी मैं उसे नहीं देख रहा था। बीच में कुछ लोग मेरे आगे आकर खड़े हुए तब वो लड़की थोड़े दूर खड़ी हो गयी मगर जैसे वो लोग गयें वो लड़की फिर मेरे क़रीब आकर खड़ी हो गयी। जानते हो अरमान तब मुझे ऐसा लगा कि मानों इतने लोगों के बीच एक अंजान लड़की मेरे साथ ख़ुद को सुरक्षित और सहज महसूस कर रही है तब मुझे ख़ुद पर बड़ा गर्व महसूस हुआ। उसको अगर मैं देखता तो शायद मुझे थोड़ी देर की ख़ुशी मिलती मगर उसे ना देखकर मैं अपने आप से बहुत ज़्यादा ख़ुश हूँ। और "आज़ादी का मतलब" भी तो यही होता है न अरमान कि सबको बराबरी का सम्मान मिलें। बिलकुल सही कहा तुमने अमन- अरमान ने कहा और चलो कुछ देशभक्ति के गीत सुनते हैं। हाँ, लता जी की' ऐ मेरे वतन के लोगों' सुनेंगे और भी कई गाने मगर उससे पहले एक कविता सुनाता हूँ, जिसे मेरे दोस्त राकेश ने लिखा है- अमन ये कहते हुये कविता सुनाने लगा-

देखते ही दिल में उतर गयें,
इस बात की दुहाई देता है.।
फिर ज़ुल्फ़ों से लेकर पाँवों तक,
घूर-घूर के वो देखता है..॥

खूद की आँखों में शर्म नहीं होती,
और दूसरों को शर्मिंदा करता है..॥
पहनावे को तो कभी प्रवर्ति को,
दोष खूब वो देता है..॥

देखने में कोई बुराई नहीं,
मगर शिकारियों की नजर वो रखता है.।
मौका उसे मिलते ही,
सारे पर वो नोच लेता है..॥

जो ऊँची उड़ान भर सकती है,
अब वो चलने में भी डरती है.।
जो फूल जहाँ को सुगंधित कर सकती है,
अब वो खिलने में भी झिझकती है..॥

चलो माना हुस्न उकसाती है उसे,
फिर नन्हीं कलियों को क्यों तोड़ा जाता है.?
जिन फूलों की दो-चार पत्तियाँ ही बची,
क्यों उनकों भी शिकार समझा जाता है..??

रिश्तों की आड़ में भी,
वो शोषण करता है.।
न जाने किस-किस का मुखौटा लगाये,
वो अपने बीच ही रहता है..॥

भरोसा अब किस पे करें,
आज नारी ये सोचती है.।
गैर हो या हो अपना,
नजरों में सम्मान खोजती है..॥

आग्रह है जिसे चुनौती समझो,
प्रण लो आज से ही सब सुरक्षित हो.।
पुरूष हो तो पुरूषार्थ दिखाओ,
जीवन का भावार्थ बताओ..॥©RRKS।।

Tuesday, July 26, 2016

"सब मिलकर ही भारत कहलाते हैं"।

"सब मिलकर ही भारत कहलाते हैं"।

अमन, बचपन से ही ख़ुद को किसी शहर, गाँव या राज्य से ज़्यादा, ख़ुद को भारतीय कहलाना पसंद करता था। बचपन में वैसे भी किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है की वो किस शहर, गाँव या राज्य से है, बस माता-पिता का प्यार, भाई-बहन और दोस्तों का साथ ही मायने रखता है। हालाँकि माता-पिता, नाम के बाद पता या जगह से ही इंसान की पहचान होती है मगर जैसे-जैसे इंसान बड़ा होता है वैसे-वैसे इंसान को दुनिया और दुनियादारी समझ आने लगती है। अमन भी इन सब बातों को समझने लगा था। उसके कई दोस्त, शिक्षक-शिक्षिका दूसरे शहर और कई तो अलग-अलग राज्य से भी थे। उनके बीच जब कभी भी पढ़ाई या खेल के अलावा कोई बात होती थी तो सभी अपने-अपने जगह की विशेषता बताते और पूछते कि बड़ा होकर कौन क्या बनेगा। डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, वक़ील जवाब में यही सब होते थे। अमन लड़ाकू विमान चालक(फ़ाईटर पायलट) बनना चाहता था, देश-भक्ति का जज़्बा और रफ़्तार से प्यार, सबसे बड़ी वजह थी इस पसंद के पीछे। मगर अमन एन.डी.ए. की परीक्षा पास(उत्तीर्ण) न कर सका जिस में पास कर के ही वो फ़ाईटर पायलट बन सकता था।
फिर अमन अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए दूसरे राज्य गया, मगर वहाँ के कई लोग अपने राज्य को श्रेष्ठ बताते और अमन के राज्य और उसके राज्य के लोगों का मज़ाक़ उड़ाते। अमन जवाब में अपने राज्य की अहमियत और गुण उनको समझाता और साथ ही कई दूसरे राज्यों की विशेषता भी बताता, मगर वे लोग उसकी बात अनसुना कर देते। अमन इन सब बातों को सुनता, उनको जवाब भी देता मगर दुखी होता था ये सोचकर की अपने ही देश में उसे ये समझाना पड़ता है की सभी राज्य बराबर महत्व रखते हैं और "सब मिलकर ही भारत कहलाते हैं" इन सब के बाद तो अमन ख़ुद को भारतीय कहलाना ज़्यादा पसंद करने लगा, क्योंकि अमन के दिलोदिमाग़ में ये आ गया था कि अगर वो भी अपने राज्य को बेहतर बताने में लगा रहेगा तो किसी को कुछ हासिल तो होगा नहीं बल्कि एक दूसरे के प्रति नफ़रत ज़रूर बढ़ा देगा।
लिहाज़ा वो अपनी पढ़ाई पूरी कर एक कंप्यूटर कम्पनी में बतौर प्रबंधक(मैनेजर) काम करने लगा। एक बार अमन के पास भारतीय फ़ौज(इंडियन आर्मी) से कंप्यूटर की माँग आयी। अमन उनकी माँग समझने के लिए फ़ौज के उस युनिट(विभाग) में सुबह क़रीब 11 बजे पहुँच गया, जहाँ कंप्यूटर की ज़रूरत थी। अमन वहाँ पहले कर्नल वीर से मिला जिन्होंने अमन को बुलाया था फिर कर्नल वीर ने मेजर दीप और सूबेदार ओम को भी बुला लिया और फिर वे सब अमन से उसके कम्पनी और कम्पनी के उत्पाद(प्रोडक्ट) के बारे में समझें और अपनी ज़रूरत अमन को समझाने लगें। अमन उनकी ज़रूरत को समझ, उनके लिए अपनी कम्पनी की सबसे अच्छे प्रोडक्ट का डिमौन्स्ट्रेशन(प्रदर्शन) किया। जबकि डिमौन्स्ट्रेशन करना अमन का काम नहीं था। असल में अमन जितने भी अधिकारी से मिला सभी ने अमन को सम्मान भी दिया और अमन को वहाँ अपनापन भी मिला तो उसने ख़ुद ही डिमौन्स्ट्रेशन कर के दिखा दिया। सूबेदार ओम तो अमन को इज़्ज़त से सर बुला रहे थे। इन सब में क़रीब 2-3 घंटे बीत गये तब कर्नल वीर ने सूबेदार ओम को बुलाया और अमन के लिए दोपहर के खाने का बंदोबस्त करने को कहा। सूबेदार ओम, अमन के पास आयें और बोले- सर चलिए पहले भोजन कर लेते हैं। फिर अमन को सूबेदार ओम उनके कैंटीन ले गयें और वहाँ अमन ने देखा सब अपनी-अपनी थाली लिए ख़ुद खाना लेकर खा रहे थे जैसे बुफे पार्टी में होता है। सूबेदार ओम ने एक टेबल-कुर्सी की तरफ़ इशारा करते हुये अमन से कहा- सर आप यहाँ बैठो मैं अभी आता हूँ। अमन उस कुर्सी पे बैठ गया मगर उसने देखा कि सूबेदार ओम एक हवलदार से एक थाली लगाने को कहे और एक थाली वो ख़ुद लगाने लगे फिर दोनों थाली लेकर अमन की तरफ़ आने लगे। अमन को ये अटपटा लगा और वो उठ के सूबेदार ओम के पास जाकर उनसे एक थाली ली और कहा- आप लोग वैसे भी देश की बहुत सेवा करते हैं, मुझे मेरी थाली कम से कम ख़ुद लेने दीजिए। फिर कई और जवान भी अमन और सूबेदार ओम के पास आकर बैठ कर खाने लगे और आपस में बातें करने लगें। खाना खाकर अमन कर्नल वीर से मिला तो उन्होंने अमन को उसके कम्पनी के प्रोडक्ट को लगाने का आर्डर दे दिया। अमन दो दिन बाद एक इंजीनियर को साथ लेकर कंप्यूटर लगाने पहुँचा, हालाँकि आज अमन की ज़रूरत नहीं थी मगर कर्नल वीर और सूबेदार ओम चाहते थे कि अमन भी साथ रहे और शायद अमन का फ़ौज के प्रति बचपन से लगाव के कारण कंप्यूटर लगाते वक़्त वो इंजीनियर को लेकर पहुँच गया। जब कंप्यूटर लगाया जा रहा था तब वहाँ दो हवलदार, एक इंजीनियर, अमन, सूबेदार ओम और एक सूबेदार विवेक मौजूद थे तभी वहाँ एक और सूबेदार आलोक आयें और बोलें- ये सिविलयंस कंप्यूटर लगाने आयें है क्या? सूबेदार आलोक की बात सुन अमन को ऐसा लगा जैसे फिर से कोई अपने को श्रेष्ठ बताना और जताना चाह रहा हो। अमन सूबेदार आलोक की तरफ़ देखा पर बिना जवाब दिये अपने इंजीनियर को काम बताने लगा ही था कि सूबेदार ओम ने कहा- आलोक साहब जब आप भी फ़ौज से वापस जाओगे तब आप भी एक सिविलयन ही हो जाओगे। सूबेदार आलोक कुछ कहे बिना वहाँ से चले गयें मगर अमन सूबेदार ओम की तरफ़ देखा तो सूबेदार ओम ने कहा ऐसे लोग भूल जाते हैं कि वे तो फ़ौज में हैं पर उनके परिवार वाले तो सिविलयन ही है। सूबेदार ओम की बातें सुन अमन की आँखों में सूबेदार ओम के लिए गर्व और सम्मान था।
इन सब के एक साल बाद समाचार बना हुआ था कि फ़ौज अपनी शक्ति का ग़लत या अनुचित उपयोग कर रही है। कई बुद्धिजीवी तो ये तक कह रहे थे कि फ़ौज वाले सीमा रेखा पर बलात्कार करते हैं। ये सब सुन-पढ़ कर अमन को उन बुद्धिजीवियों से सवाल करने की इच्छा हुई जो शायद कभी सीमा के पास तक नहीं गये, किसी फ़ौजी से कभी मिले नहीं, जो शायद ये सब बोलकर किसी राजनीति का भाग बनना चाहते थे या राजनीति करना चाहते थे और इन सब बातों के समर्थकों से भी कि जब फ़ौज इतनी घटिया और क्रूर काम कर रही है तो देश की सीमा की रक्षा कौन कर रहा है? सीमा के पास रह रहे लोग किसके भरोसे चैन की नींद सोते है? सभी अपनी-अपनी राजनीति या फ़ायदे के लिए पूरे फ़ौज को कैसे ग़लत बोल सकते हैं? फ़ौज अगर कोई सख़्त क़दम लेती भी है तो किसके लिए? क्या माता-पिता अपने बच्चों को सज़ा नहीं देते अगर बच्चा कोई ग़लती करें तो? इसका जवाब शायद बुद्धिजीवी ये देंगे कि सज़ा का मतलब ये नहीं की मार ही दिया जाये और फिर वही बुद्धिजीवी भारत की महान चलचित्र(फ़िल्म) मदर इंडिया देखकर कहेंगे की वैसा बेटा हो तो वैसी ही माँ होनी चाहिए। बुद्धिजीवी जो अपनी संगठन(पार्टी) बनाकर सुबह-शाम दूसरे पार्टी को गाली देते रहते हैं, उनके लिए कुछ मुद्दा नहीं तो यही मुद्दा सही। इन्हीं सब से अमन दुखी हो गया और फिर अपने दोस्त राकेश की लिखी कविता पढ़ने लगा-

कभी घर में, तो कभी सरहद पर.।
कभी अपनों पे, तो कभी गैरों पर.।
जोर बताना पड़ता है, हथियार उठाना पड़ता है..।।

खामोशी को जब कमजोरी समझे सब,
तब दहाड़ लगाना पड़ता है.।
शान्ति स्थापित करने को कभी,
प्रचंड रूप दिखाना पड़ता है..।।

गर्व है मुझे उन लोगों पे,
जिन्होनें देश के आवाम का दर्द सुना.।
गर्व है मुझे उन लोगों पे,
जिन्होनें देश सेवा का काम चुना..।।

आभारी हूँ उन देश भक्‍तों का,
जिन्होनें दुश्मनों के इरादों को नाकाम किया.।
कृतज्ञ हूँ उन शहीदों का,
जिन्होनें कर्तव्य के लिये जान तक कुर्बान किया..।।

अफसोस है ऐसे लोगों से,
जिनको याद दिलाना पड़ता है.।
खेद है ऐसे इंसानों से,
जिन्हें इंसानियत सिखाना पड़ता है..।।©RRKS।।

Saturday, July 23, 2016

सच्ची घटनाओं पे आधारित- " दलित बन गया"

सच्ची घटनाओं पे आधारित- " दलित बन गया"

अमन, गुजरात के अहमदाबाद शहर में एक निजी कम्पनी के लिए बतौर प्रबंधक(मैनेजर) अपने शहर बोकारो स्टील सिटी जो झारखंड में है से आया था। अमन नई जगह में नई भाषा, नई परंपरा, नई संस्कृति, नयें लोगों से तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा था। इस नयी जगह में जितने भी नयें लोगों से अमन मिला सभी अच्छे ही मिलें, तो जल्द कईयों से दोस्ती भी हो गयी। चूंकि अमन अकेला ही था तो वो मेस(भोजनालय) में ही खाता था, हालांकि खाना वो गुजराती खाता था मगर दाल पंजाबी खाता था। अरे हाँ, पहले ये समझ लेते हैं की आखिर ये पंजाबी और गुजराती दाल होती क्या है। पंजाबी दाल मतलब स्वाद में तीखी और गुजराती मतलब स्वाद में मीठी। तीन- चार महीनें में ही अमन को अहमदाबाद भी धीरे-धीरे जमने लगा था, यहाँ के शांत और खुशनुमा माहौल से वो प्रभावित था।

मगर एक रात अचानक सड़क पे बहुत शोर मचने लगा,घर के बरामदे से जब उसने देखा तब करीब 40-50 के झुंड में कई युवा सड़क पर हाथों में लोहे-लकड़ी से तोड़-फोड़ कर रहे थे और धीरे-धीरे ये भीड़ और बेकाबू हो गयी और कई सरकारी सम्पत्ति को आग तक लगा दियें। अमन फिर अपने कमरे में आकर टीवी में समाचार देखने-सुनने लगा तो पता चला कि इंसानी समाज में एक वर्ग जाति के नाम पे आरक्षण के लिए जो आंदोलन कर रही थीं, वहाँ कुछ बातों को लेकर पुलिस वालों और तथाकथित कुछ आंदोलनकारियों के बीच झड़प हो गई और देखते-देखते चंद घंटों में पूरा गुजरात जलने लगा। नतीजतन तीन दिन तक प्रदेश में कर्फ़्यू और अमन जैसे बिना कोई गुनाह किए अपने घर में बंद कुछ भी खाकर सजा काटने को मजबूर था। *अमन के दिलोदिमाग में एक और सवाल भी था हर उस तथाकथित आंदोलनकारियों से जो हर तरह से सक्षम भी थे कि आखिर उन गरीबों का क्या जो रोज जी तोड़ मेहनत करके भी अपने व अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी की भी व्यवस्था नहीं कर पाते हैं, उनकों किस गुनाह की सजा मिल रही थी। और शायद उन गरीबों में अधिकांश, जाति से भी निचले तबके की ही हों। अमन यही सोचता रहा कि पता नहीं क्या और किस के लिए ये आंदोलन था, जिसमें किसी की भलाई शायद न के बराबर मगर कईयों के लिए सिर्फ नुकसान ही नुकसान।*मगर जैसा कि हमेशा होता आया है, लोग ये सोचने के बजाय कि खुद उनमें क्या कमियाँ हैं न सोच कर पुलिस को, सरकार को कोस कर चार-पाँच दिन बाद फिर अपने अपने जिंदगी में पहले की ही तरह मशगूल हो गयें और माहौल भी पहले की ही तरह सामान्य हो गया। अमन भी पहले की तरह ही गुजराती थाली में पंजाबी दाल का आंनद लेने लगा। देखते देखते अमन को गुजरात में अब एक साल से ज्यादा हो गया।

एक रात अमन अपने टीवी पर समाचार देख-सुन रहा था की तभी टीवी स्क्रीन पे समाचार चलने लगा की चार दलितों को बाँधकर बहुत बेरहमी से कई लोगों ने पिटाई की। पिटने वाले खुद को गौ रक्षक कहते हैं, पिटने का कारण था की गौ रक्षकों को लगा की मरी हुई गाय जो उन दलित लड़कों के पास से पाया गया था, उसे उन लड़कों ने ही मारा है। बात गलत थी तो खबर बनना ही था, मगर बात इतनी बढ़ गयी की कई जगह भीड़ उग्र हो सरकारी संपत्ति को आग लगाने लगे। इस आग में घी का काम समाचार वाले करने लगे, कई महान पत्रकार अपने चैनल के माध्यम से कुछ विद्वानों को साथ बिठाकर इस चर्चा में लग गयें कि क्या दलित युवकों के साथ सही हुआ। इसके अगले दिन दलित समाज की ओर से गुजरात बंद का आह्वान किया गया जिसका मिलाजुला प्रभाव रहा। कई महान नेता जो दूसरे प्रदेश से थे वो भी इस दौरान उन दलित लड़कों से मिलने की घोषणा कर दियें, सिर्फ ये बताने के लिए की वो दलितों के साथ हैं। खैर अगले दिन अमन अपने औफिस(कार्यालय) गया, इधर माहौल सामान्य ही था मगर कुछ जगहों पे बंद का असर था लिहाजा औफिस में चर्चा होने लगी उसी बात पर। *अमन के औफिस में प्रकाश नाम का एक दलित कर्मचारी भी है, ये बात अमन जानता था और जब चर्चा हो रही थी तब प्रकाश वहीं मौजूद भी था। अमन ने चर्चा के दौरान कहा की इस बंद से कितनों का नुकसान होता है, लोग सोचते भी नहीं और किसी की गलती की वजह को जाति या धर्म का नाम देकर उपद्रव करते हैं, इस पर प्रकाश ने कहा की चार दलित के साथ गलत हुआ और कुछ दलित इसको पूरे दलित समाज से जोड़ रहे हैं। ये सुनकर अमन को बहुत अच्छा लगा और उसने प्रकाश की सोच की तारीफ़ की और कहा की यदि वहाँ चार दलित की जगह चार मुस्लिम होते तब शायद ये दलित भी उन गौ रक्षकों के साथ मिलकर पिटाई ही नहीं बल्कि मार ही दियें होते उन चारों को तब वो खुद को दलित नहीं बल्कि हिंदू कहते और अगर वो खुद को इंसान कहते हैं तो पहले इंसानियत को समझें। जिन लोगों ने पिटा उनकों सजा मिलनी ही चाहिए मगर हिंदू या मुस्लिम या दलित या कोई और जाति-धर्म का दुश्मन न मानकर बल्कि इंसानियत का दुश्मन मानकर।*

इस घटना के अगले ही दिन उत्तर प्रदेश के एक नेता ने वहीं की एक महिला नेता की बुराई बताते हुए उस महिला नेता के चरित्र की तुलना वैश्या से कर दिया। संसद में सारे नेता, टीवी पर सारे महान पत्रकार इसकी निंदा करने लगे। करनी भी चाहिए, बहुत ज्यादा निंदा होनी चाहिए। अमन टीवी पर ही खबर देखा-सुना मगर ये क्या, जिस महिला नेता के बारे में घटिया बातें बोली गयी वो इसको दलित नेता का अपमान साबित करने लगीं और कई महान नेता और महान पत्रकार उस महिला का अपमान न बोलकर दलित महिला का अपमान बोलने लगे। पूरे देश में इसके खिलाफ आवाज उठीं मगर मुद्दा घटिया बयान से भटक कर "दलित बन गया"। फिर महिला नेता और उनके कई सहयोगी अपमान के बदले में उस नेता जिसने घटिया बयान दिया था उसकी पत्नी और बेटी का अपमान करने लगें।

अमन बहुत ही दुखी मन से अकेले में विचार करने लगा कि *लोग अपने अक़्ल का इस्तेमाल क्यों नहीं करतें.? क्यों किसी नेता या पत्रकार से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि उनकों या उनके सभी विचारों को महान मानने लगते हैं.?* और अमन फिर अपने दोस्त राकेश की लिखी कविता पढ़ने लगा-

जब पूछता हूँ मेरे मन से,
क्या बदल रहा है हिन्दुस्तान.?
आवाज तब आती है अंदर से,
क्या तू खुद को बदल पाया इंसान..??

वही जाति की राजनीति,
वही धर्म पे कूटनीति.।
अधिकारों का हनन करके,
सुना रहे सब आपबीती..॥

ताजमहल कब्र है या है शिवालय,
इस पर हंगामा आज भी है.।
टूट गयें मंदिर और मस्जिद,
आक्रोश जिवित आज भी है..॥

शहरों में सब बस रहे हैं,
गाँव बदहाल आज भी है.।
हजारों अरबपति बन गये हैं,
लाखों गरीब आज भी है..॥

नारी शोषण आज भी है,
बाल कुपोषण आज भी है.।
शासन प्रशासन सुधार रही है,
मगर भ्रष्टाचार आज भी है..॥

हाँ हो रही है उन्नति,
ऊँचा हो रहा है स्थान.।
सम्प्रदाय के नाम पे मगर,
फिर बँट रहा है हिन्दुस्तान..॥

आज नहीं होना है कुर्बान,
अगर बढ़ाना हो देश का मान.।
अमल करो बस इस नारे को,
जय जवान जय किसान..॥

मन का मैल दूर करो,
सफल होगा स्वच्छता अभियान.।
गर्व से फिर कहना तुम,
मेरा भारत है महान..॥
मेरा भारत है महान..॥© RRKS..॥

Sunday, July 17, 2016

कल किसी मोड़ पे अगर मिलोगे कहीं,
ख्याल इस बात का रखना जरा.।
न देखना प्यार से तुम मेरी ओर,
वरना आँखें बता देंगे राज गहरा..॥
Kal kisi mod pe agar miloge kahin,
Khayal is baat ka rakhna jara..
Na dekhna pyar so tum meri ore,
Varna aankhein bata denge raaz gahra..

जा रहे हो अगर तुम दूर मुझसे,
तो साथ यादों के मेरे भी ना रहना.।
भले समझो इसे तुम मेरी बेखुदी,
मगर प्यार था मुझसे कभी ना कहना..॥
Jaa rahe ho agar tum dur mujhse,
To saath yaadon ke mere bhi na rahna..
Bhale samjho ise tum meri bekhudi,
Magar pyar tha mujhse kabhi na kahna..

जाते जाते मेरी ये बातें सुन लो,
रह ना जाये कोई गिला शिकवा.।
किसी और से तुम प्यार करो न करो,
ना रहूँगा मैं अब तुम्हारा मितवा..॥
Jaate jaate meri ye baatein sun lo,
Rah na jaye koi gila shikwa..
Kisi aur se tum pyar karo na karo,
Na rahunga main ab tumhara mitwa..

मेरा है क्या मैं तो हूँ अजनबी,
अपनों के पास लौट जाऊँगा मैं.।
जो बातें आज रूला रही है मुझे
कल इन्हीं पे ठहाके लगाऊँगा मैं..॥©RRKS!!
Mera hai kya main to hoon ajnabi,
Apno ke paas laut jaunga main..
Jo baatein aaj rula rahi hai mujhe,
Kal inhi pe thahake lagaunga main..©RRKS!!